तेनालीराम का मरियल घोड़ा

     राजा कृष्‍णदेव और चतुर तेनाली अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर सैर के लिए निकले।
     राजा का घोड़ा अरबी नस्‍ल का बढि़या घोड़ा था। जिसकी कीमत भी काफी थी।
     इधर तेनालीराम का घोड़ा मरियल-सी अवस्‍था का वह बड़ी ढीली-ढीली चाल से चल रहा था। तेनालीराम अगर अपने इस घोड़े को बेचना चाहता, तो कोई उसकी 40 स्‍वर्ण मुद्राएं कीमत भी न लगाता।
     राजा कृष्‍णदेव ने तेनाली के घोड़े की ओर देखते हुए कहा, "कैसा मरियल-सा घोड़ा है तुम्‍हारा ! जो करतब मैं अपने घोड़े के साथ दिखा सकता हूँ, क्‍या तुम अपने घोड़े के साथ भी वह करतब कर सकते हो ?"
     " जो करतब मैं अपने घोड़े के साथ दिखा सकता हूं महाराज, वह आप अपने घोड़ें के साथ कभी नहीं दिखा सकते।"
telairam ka mariyal ghora

     " सौ-सौ स्‍वर्ण मुद्राओं की शर्त लगाते हो ?" राजा कृष्‍णदेव ने कहा।
     " जैसी आपकी इच्‍छा महाराज !" चतुर तेनाली महाराज की शर्त से सहमत हो गया।
     उस समय राजा कृष्‍णदेव और तेनाली तुंगभद्रा नदी पर बने नाव के पुल पर से गुजर रहे थे। उस समय बाढ़ आई हुई थी। पानी बहुत तेज गति से बह रहा था। और उसमें जगह-जगह भंवर भी दिखाई दे रही थी।
     अचानक तेनाली अपने घोड़े पर से उतरा और उसने अपने मरियल से दिखने वाले घोड़े को पुल से नीचे तेज बहते पानी में धक्‍का दे दिया। फिर महाराज से बोला, "अब आप भी अपने घोड़े के साथ्‍ा ऐसा करके दिखाइए।" तेनाली ने राजा से कहा।

     राजा कृष्‍णदेव अपने कीमती और सुंदर घोड़े को पानी में धक्‍का देते हुए सकुचाये। फिर बोले, " ना बाबा ना मैं मान गया कि मै अपने घोड़े के साथ वह करतब नहीं दिखा सकता, जो तुम दिखा सकते हो।" राजा ने यह कहते हुए तेनाली को शर्त के मुताबित सौ स्‍वर्ण मुद्राएं दे दी।
     " लेकिन तुम्‍हें वह विचित्र बात सूझी कैसे ?" राजा कृष्‍णदेव ने तेनाली से पूछा।
     " महाराज, मैंने एक पुस्‍तक में पढ़ा था कि बेकार और निकम्‍मे मित्र का यह लाभ होता है कि जब वह न रहे, तो कोई दु:ख नहीं होता। और फिर मेरा घोड़ा भी चालीस-पचास स्‍वर्ण मुद्राएं से ज्‍यादा कीमत का नहीं था और मैंने आपसे शर्त में सौ स्‍वर्ण प्राप्‍त कर लीं।
     तेनाली की चतुराई और समझभरा जवाब पाकर राजा कृष्‍णदेव मुस्‍कराते हुए बोले, " वाकई, तुम्‍हारी चतुराई और समझ का कोई ज्ञानी नहीं है।"    

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